Friday, June 7, 2013

not now

दिन, रात
कई साल भी
उसी घर से होकर
आते-जाते रहे,
मेरे पैर खिडकी पर
रुक से जाते थे,
बंद शीशों से
हवा दीख तो रही थी,
पर उनमें कोई महक
अब नहीं रही थी.

ऊँची इमारतें
ऊँचे ओहदे,
खूब काबिलियत
खूब कामयाबियाँ
खूब शोहरत,
आँखें अब खूब
चमक तो रही थीं,
पर उनमें कोई खोज 
अब नहीं रही थी.

तेज बातें होती गयीं
तेज आदतें होती गयीं,
कम हुआ तो तहजीब
गम हुआ तो सब्र,
सब कहीं से कहीं को
भाग रहे थे,
साथ भी चल रहे थे
पर उनकी कोई मंजिल
अब नहीं रही थी.

कोने में बैठा कोई देखता
मेरी ओर भी मुड़े कोई
ऐसा भी सोचता,
कि फूल हर-तरह के
खिले हुए थे
बेरियां भी लदी पड़ी थीं,
पर कोई मासूमियत
वहाँ पर उनसे खेल
अब नहीं रही थी.



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