कभी बेवजह
तो कभी जानबूझकर
दिन भर भटकते हैं,
पर जान कर खुश होतें हैं
कि प्यार मेरा
मेरे नजदीक ही है
मेरे पास ही है.
बनावट है
तो कहीं
सजावट है,
क्या देखें
क्या सराहें
पर जान कर खुश होतें हैं
की तू कहीं इन्ही में,
इधर ही है
और खास भी है .
और खास भी है .
दौलत
सूरत
शोहरत
ढूंढ़ते हैं सब मगर,
मैं तो अपना
सादापन,
सादापन,
अपना बचपना खोजता हूँ.
कोई कुछ बताता नहीं
कोई कुछ जताता भी नहीं,
अनजाने में ही
कुछ होता है
और मैं गुनगुनाने लगता हूँ.
कभी किसी ने भी
आवाज दे
बुलाया था शायद,
आज भी
कोई किसी और को
आवाज दे
बुलाया था शायद,
आज भी
कोई किसी और को
पुकारता है
और मैं मुस्कुराने लगता हूँ.
No comments:
Post a Comment