दिन सुना था
जोड़े में आता है
साथ अपने
काली सी..
कोमल सी
रात लाता है.
पर भटकता
अपने ही सवालों में
किसी की कही से
तो दुनिया भर की
झूठ-सही से,
घिरता उन्ही दीवालों में
जी के जंजालों में.
शाम हो जाती है
थक-मांद कर
वही सड़क पर
बैठ जाता हूँ.
तारे भी गुजरते हैं
बेरुखी से देखते है
दूर जाना होता है उन्हें
समय भी कुछ नहीं कहता
अपने पैरों की घडी
उतार नहीं सकता है वो
एक कारवां
हाथ देता भी है
जानता हूँ उन्हें भी
दूसरे दिशा में जाना है
अब पौ फिर से
फटने को है
आस का एक बादल था
वो भी हटने को है
कि घर न ले जाये कोई
पर किसी ओर से
अपने घर की
कोई बात तो हो
मेरे घर में
कोई रात तो हो
जोड़े में आता है
साथ अपने
काली सी..
कोमल सी
रात लाता है.
पर भटकता
अपने ही सवालों में
किसी की कही से
तो दुनिया भर की
झूठ-सही से,
घिरता उन्ही दीवालों में
जी के जंजालों में.
शाम हो जाती है
थक-मांद कर
वही सड़क पर
बैठ जाता हूँ.
तारे भी गुजरते हैं
बेरुखी से देखते है
दूर जाना होता है उन्हें
समय भी कुछ नहीं कहता
अपने पैरों की घडी
उतार नहीं सकता है वो
एक कारवां
हाथ देता भी है
जानता हूँ उन्हें भी
दूसरे दिशा में जाना है
अब पौ फिर से
फटने को है
आस का एक बादल था
वो भी हटने को है
कि घर न ले जाये कोई
पर किसी ओर से
अपने घर की
कोई बात तो हो
मेरे घर में
कोई रात तो हो
No comments:
Post a Comment