शहर में
अब बच्चे
मिटटी से नहीं खेलते
कंक्रीट, तारकोल,
और टाईल्स
की एक परत
बन रही है,
अब शहर में
बड़े भी
मिटटी छु नहीं पाते.
शहर में
मिटटी
किसी खुशकिस्मत के
लॉन के घास के नीचे दबी है
या फिर गमलों कि कतारों में
कैद होती हैं.
कभी तेज हवाओं मैं
उठती हैं
धुल बन उड़ती हैं
जैसे कि अपना
वजूद ढूँढने
निकली हैं.
अब फ़िक्र ये है
कहीं मिटटी से जुड़ा रहना
एक मुहावरा ही
न बन रह जाये
जिस मिटटी के
हम खुद बने हैं
वही हमसे
दूर न हो जाये.
अब बच्चे
मिटटी से नहीं खेलते
कंक्रीट, तारकोल,
और टाईल्स
की एक परत
बन रही है,
अब शहर में
बड़े भी
मिटटी छु नहीं पाते.
शहर में
मिटटी
किसी खुशकिस्मत के
लॉन के घास के नीचे दबी है
या फिर गमलों कि कतारों में
कैद होती हैं.
कभी तेज हवाओं मैं
उठती हैं
धुल बन उड़ती हैं
जैसे कि अपना
वजूद ढूँढने
निकली हैं.
अब फ़िक्र ये है
कहीं मिटटी से जुड़ा रहना
एक मुहावरा ही
न बन रह जाये
जिस मिटटी के
हम खुद बने हैं
वही हमसे
दूर न हो जाये.
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