तुम आये हो आज
अपने ही घर में
अतिथि बनकर..
कुनबे में तुम्हें
वही जानते हैं
जिनके घर की
खिडकियां खुली थीं..
और जिन्होंनें
तुम्हारी आवाज पर
बाहर आकर
तुमसे अपने सर
पर हाथ रखवाया था.
उनके घर तुम
रुके भी थे
और उनके हाथ से
जूठे बेर और
केले के छिलके भी
खाए थे.
तुमने भी फिर
खुश होकर
अपने पारस पत्थर से
उनके स्याह पड़ चुके
जीवन को
सोना कर दिया था.
मेरे घर भी ऐसे ही कुछ
आये थे तुम
और इस बंजर पड़े
जमीन में
एक बीज बोया था.
काँटों के बीच भी
फूल खिल रहे हैं अब वहां
जिन्हें रोज सुबह उठकर
गिनता हूँ
उनकी महक में
खुद को भुला देता हूँ
उनमें से सुन्दर
सुंदरों को
चुन-चुन
उस रस्ते पर
बिखेरता हूँ.
कि तुम इधर फिर आओगे
बार-बार आओगे..
अपने ही घर में
अतिथि बनकर..
कुनबे में तुम्हें
वही जानते हैं
जिनके घर की
खिडकियां खुली थीं..
और जिन्होंनें
तुम्हारी आवाज पर
बाहर आकर
तुमसे अपने सर
पर हाथ रखवाया था.
उनके घर तुम
रुके भी थे
और उनके हाथ से
जूठे बेर और
केले के छिलके भी
खाए थे.
तुमने भी फिर
खुश होकर
अपने पारस पत्थर से
उनके स्याह पड़ चुके
जीवन को
सोना कर दिया था.
मेरे घर भी ऐसे ही कुछ
आये थे तुम
और इस बंजर पड़े
जमीन में
एक बीज बोया था.
काँटों के बीच भी
फूल खिल रहे हैं अब वहां
जिन्हें रोज सुबह उठकर
गिनता हूँ
उनकी महक में
खुद को भुला देता हूँ
उनमें से सुन्दर
सुंदरों को
चुन-चुन
उस रस्ते पर
बिखेरता हूँ.
कि तुम इधर फिर आओगे
बार-बार आओगे..
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