Sunday, August 7, 2011

your call

तुम आये थे 
मेरे घर 
और दरवाजे पर 
दस्तक दी थी 

मैं नहीं था वहां
तुमने इन्तेजार भी 
किया होगा 
और फिर 
लौट गए थे तुम

फिर मैं 
तुम्हारी गली से 
गुजरा था
और तुम्हारे दरवाजे पर 
दस्तक दी थी
अब तुम नहीं थे वहां 
मैनें भी
इन्तेजार 
किया था तुम्हारा 
तुम नहीं आये वहां

पास की गलियों में 
फिर मैं घूमा था 
हर दरवाजे खटखटाए 
हर घर में पूछा था 
कि तुम
कभी थे वहां  !

फिर 
अगले मोड़ पर 
कोई मिला था 
कहता था 
तुम्हारा तो वो घर है 
जिसमें दीवार तो है 
पर कोई दरवाजा नहीं है 

जब ईन टेढ़े-मेढ़े
रास्तों को छोड़  
दूर जाती पगडण्डी पर
कुछ देर चलोगे
सूरज कि पहली किरण 
से नहाया हुआ 
बादलों कि पृष्टभूमि में
एक सुने से टीले पे 
वो मिलेगा 

खास होगा 
गर खोज होगी
मुकाम होगा
गर मौज होगी

कि वो मकान
कोई मामूली नहीं है
मुश्किल भी नहीं है
उसे खोजना
गर तलब है
और चाह है
कितनों को मिला है 

अब मैं 
हर दरवाजे पर 
दस्तक नहीं देता 
बस तुम्हारा 
वो घर ढूँढने निकलता हूँ

ढूंढता हूँ 
और फिर 
जब थक जाता हूँ
लौट कर
अपने कमरे में 
लेट जाता हूँ 
दीवारों को देखता हूँ 
जंगले से आ रही
थोड़ी सी 
रोशनी को देखता हूँ 
और इन्तेजार करता हूँ
तुम्हारे
दूसरे दस्तक की .


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