तुम आये थे
मेरे घर
और दरवाजे पर
दस्तक दी थी
मैं नहीं था वहां
तुमने इन्तेजार भी
किया होगा
और फिर
लौट गए थे तुम
फिर मैं
तुम्हारी गली से
गुजरा था
और तुम्हारे दरवाजे पर
दस्तक दी थी
अब तुम नहीं थे वहां
मैनें भी
इन्तेजार
किया था तुम्हारा
तुम नहीं आये वहां
पास की गलियों में
फिर मैं घूमा था
हर दरवाजे खटखटाए
हर घर में पूछा था
कि तुम
कभी थे वहां !
फिर
अगले मोड़ पर
कोई मिला था
कहता था
तुम्हारा तो वो घर है
जिसमें दीवार तो है
पर कोई दरवाजा नहीं है
जब ईन टेढ़े-मेढ़े
रास्तों को छोड़
दूर जाती पगडण्डी पर
कुछ देर चलोगे
सूरज कि पहली किरण
से नहाया हुआ
बादलों कि पृष्टभूमि में
एक सुने से टीले पे
वो मिलेगा
खास होगा
गर खोज होगी
मुकाम होगा
गर मौज होगी
कि वो मकान
कोई मामूली नहीं है
मुश्किल भी नहीं है
उसे खोजना
गर तलब है
और चाह है
कितनों को मिला है
अब मैं
हर दरवाजे पर
दस्तक नहीं देता
बस तुम्हारा
वो घर ढूँढने निकलता हूँ
ढूंढता हूँ
और फिर
जब थक जाता हूँ
लौट कर
अपने कमरे में
लेट जाता हूँ
दीवारों को देखता हूँ
जंगले से आ रही
थोड़ी सी
रोशनी को देखता हूँ
और इन्तेजार करता हूँ
तुम्हारे
दूसरे दस्तक की .
good one sir :)
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