एक बार फिर
तुम्हे
वहीँ
चौराहे पर
देखता हूँ
पर
रोज की तरह
कह नहीं पाता
कुछ
भी
खुश होता हूँ
तुम्हारे बातों पर
जो सुनता नहीं
तुम्हारी हसीं पर
जो बस देखता हूँ
तुम
किसी को
देखने लगते
तो खुद को
छुपा लेता हूँ
कभी सोचता हूँ
बातें करूँगा तुमसे
सोच कर ही
रह लेता हूँ
जब तुम नहीं
होते वहां
सुनने को
बस
तुम्हारा नाम
गुनगुना लेता हूँ
हाथों में हाथ
तुम्हारा
कभी
मांगूंगा
जरुर !
तुम्हारी महक
मुझमें बस जाये
इसलिए
आज तुम्हें
बस
छु लेता हूँ
आज
मिले
फिर यू हीं
कहीं
फिर मिलो
ना मिलो
इसलिए
मुड़ मुड़ के
देख लेता हूँ
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