Thursday, August 25, 2011

once again

एक बार फिर 
तुम्हे 
वहीँ 
चौराहे पर 
देखता हूँ
पर
रोज की तरह
कह नहीं पाता 
कुछ
भी

खुश होता हूँ
तुम्हारे बातों पर
जो सुनता नहीं
तुम्हारी हसीं पर
जो बस देखता हूँ
तुम
किसी को
देखने लगते 
तो खुद को
छुपा लेता हूँ

कभी सोचता हूँ
बातें करूँगा तुमसे
सोच कर ही 
रह लेता हूँ
जब तुम नहीं
होते वहां 
सुनने को 
बस
तुम्हारा नाम 
गुनगुना लेता हूँ

हाथों में हाथ 
तुम्हारा
कभी
मांगूंगा
जरुर !
तुम्हारी महक
मुझमें बस जाये 
इसलिए 
आज तुम्हें
बस
छु लेता हूँ

आज
मिले 
फिर यू हीं 
कहीं 
फिर मिलो
ना मिलो
इसलिए
मुड़  मुड़ के
देख लेता हूँ


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