आजादी
हो तो
सोंच की हो
विचारों की हो..
आत्मा के विस्तार
सी हो.
झूठ की पट्टी
गर आँखों पे
संकीर्णता की रस्सी
गर पैरों में
कुसंस्कारों की कूबड़
लादे पीठ पे
गर हम है चलें
हर कोने पे कोई
पत्थरों को पूजता हो
खाली पेट को
कोई न पूछता हो
आदमी आदमी के ही
रक्त से अपना सीना
सींचता हो
जब सच के चेहरे चंद हों
नारों की आवाज़ भी मंद हो
परचम में भी पैबंद हो
गर ये आजादी हो
तो क्या हो !
आजादी
हो तो
सोंच की हो
विचारों की हो..
आत्मा के विस्तार
सी हो.
हो तो
सोंच की हो
विचारों की हो..
आत्मा के विस्तार
सी हो.
झूठ की पट्टी
गर आँखों पे
संकीर्णता की रस्सी
गर पैरों में
कुसंस्कारों की कूबड़
लादे पीठ पे
गर हम है चलें
हर कोने पे कोई
पत्थरों को पूजता हो
खाली पेट को
कोई न पूछता हो
आदमी आदमी के ही
रक्त से अपना सीना
सींचता हो
जब सच के चेहरे चंद हों
नारों की आवाज़ भी मंद हो
परचम में भी पैबंद हो
गर ये आजादी हो
तो क्या हो !
आजादी
हो तो
सोंच की हो
विचारों की हो..
आत्मा के विस्तार
सी हो.
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